May 22, 2024 6:29 am

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पाले से फसलों को कैसे बचाएं

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BAHUJAN NEWS DESK

लखनऊ।सरसों, गेहूँ, चना, आलू, मटर जैसी फसलों को पाले से बचाने में गन्धक का छिड़काव करने से न केवल पाले से बचाव होता है, बल्कि पौधों में लौहा तत्व की जैविक एवं रासायनिक सक्रियता बढ़ जाती है जो पौधों में रोग रोधिता बढ़ाने में एवं फसल को जल्दी पकाने में सहायक होती हैं। डाई मिथाइल सल्फो-ऑक्साइड का छिड़काव करके डीएमएसओ पौधों से पानी बाहर निकालने की क्षमता में बढ़ोतरी करता है, जिससे कोशिकाओं में पानी जमने नहीं पाता। इस तरह उनकी दीवारें नहीं फटती और फलतः पौधा नहीं सूखता है। इस रसायन का छिड़काव पाले की आशंका होने पर 75-100 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 800-1000 लीटर पानी में घोलकर करना चाहिए। यदि आशा अनुरूप परिणाम नहीं मिलें तो 10-15 दिनों बाद एक और छिड़काव करें तथा संस्तुत सावधानियाँ अवश्य बरतनी चाहिए। ग्लूकोज का छिड़काव करके इसके प्रयोग से पौधों की कोशिकाओं में घुलनशील पदार्थ की मात्रा में वृद्धि हो जाती है। फलतः तापमान कम होने पर भी कोशिकाओं की सामान्य कार्य पद्धति पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता, जिससे फसल पाले के प्रकोप से बच जाती है। साधारणतः एक किलोग्राम ग्लूकोज़ प्रति हेक्टेयर की दर से 800-1000 लीटर पानी में मिलाकर फूल आने की अवस्था में छिड़काव करते हैं। आवश्यकता अनुसार 10-15 दिनों बाद इसका पुनः छिड़काव किया जा सकता है। पाले से फसल बचाव के अन्य उपाय सीमित क्षेत्र वाले उद्यानों/नगदी सब्जी वाली फसलों में भूमि के ताप को कम न होने देने के लिये फसलों को टाट, पोलीथिन अथवा भूसे से ढक देना चाहिए। वायुरोधी टाटियांए, हवा आने वाली दिशा की तरफ यानि उत्तर-पश्चिम की तरफ बांधे। नर्सरी, किचन गार्डन एवं कीमती फसल वाले खेतों में उत्तर-पश्चिम की तरफ टाटियां बांधकर क्यारियों के किनारों पर लगायें तथा दिन में पुनः हटा देना चाहिए। फलदार वृक्षों के पास में तालाब व जलाशयों का निर्माण करने से फल वृक्षों पर पाले का असर कम पड़ता है। इसके अलावा जिन क्षेत्रों में पाला पड़ने की आशंका अधिक हो वहाँ, चुकंदर, गाजर, गेहूं, मूली, जौ इत्यादि फसलें बोने से पाले का प्रभाव कम पड़ता है।

 

 

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